ये कैसा एहसास है
दूर रहकर भी जैसे
मेरे दिल के बहुत पास है
जब दूर नहीं थे
तो करीब आ ना सके
करीब आकर भी
तुम मुझमें, मैं तुझमें
हम बनकर समा ना सके
किसी रोज़ मिलते थे
पर उस रोज़ मिलकर भी
ये एहसास पा ना सके
ये कैसा एहसास है
दूर रहकर भी जैसे
मेरे दिल के बहुत पास है ।
तेरी आंखो की वो गुस्ताखियां
तेरी जुल्फों की वो लहराना
तेरी एक झलक का वो पीछा करना
तेरे हाथो को वो अपने हाथ में थामना
तेरा पलट के फिर वो रुक जाना
वो बारिश में पूरा भीग जाना
जो कुछ भी है, वो सब कुछ
जो खट्टी मीठी तीखी यादें
जो समेट कर रखी है
वो एक एहसास ही है
ये वो एहसास है
जो दूर रहकर भी
मेरे दिल के बहुत पास है ।
- अंकित कोचर
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